अमेरिका-ईरान संघर्ष का एशिया, अफ्रीका और यूरोप के लिए गंभीर नतीजों की आशंका
वैश्विक संघर्ष का संकट: भारतीय अर्थव्यवस्था पर दोहरी मार
ईरान-इजराइल युद्ध ने शिपिंग लागत में 20% की वृद्धि और निर्यात में भारी गिरावट के साथ भारतीय व्यापार को संकट में डाल दिया है। लाल सागर मार्ग बाधित होने से पेट्रोलियम और चाय निर्यात प्रभावित हुए हैं। कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें और शेयर बाजार में अस्थिरता भारत की आर्थिक रिकवरी और IMEC कॉरिडोर के भविष्य के लिए गंभीर चुनौती हैं।
नई दिल्ली। इस संघर्ष ने यूरोप, अमेरिका, अफ्रीका और पश्चिम एशिया के साथ भारत के व्यापार के लिये महत्त्वपूर्ण प्रमुख शिपिंग मार्गों पर व्यवधान के जोखिम को बढ़ा दिया है। विश्व के रणीनीति विशेषज्ञ इस जंग से चिंतित हैं। लाल सागर और स्वेज नहर मार्ग विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण हैं, क्योंकि वे प्रतिवर्ष 400 बिलियन अमेरिकी डॉलर से अधिक मूल्य के माल के आवागमन में सहायक होते हैं। इस अस्थिरता से न केवल नौवहन मार्गों को खतरा है, बल्कि समुद्री व्यापार की समग्र सुरक्षा को भी खतरा है।
निर्यात पर आर्थिक प्रभाव: संघर्ष के बढ़ने से भारतीय निर्यात पर असर पड़ना आरंभ हो गया है। उदाहरण के लिये अगस्त 2024 में निर्यात में 9 प्रतिनिधि की गिरावट देखी गई, जिसका मुख्य कारण लाल सागर में संकट के कारण पेट्रोलियम उत्पाद निर्यात में 38 प्रतिशत की भारी गिरावट है। ये निर्यात भारत के व्यापार का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा है तथा कुल पेट्रोलियम उत्पाद निर्यात का 21 प्रतिशत यूरोप को प्राप्त होता है। मूलत: चाय उद्योग में कमजोरी देखी गई है। रान भारतीय चाय के सबसे बड़े आयातकों में से एक है (भारत का निर्यात वर्ष 2024 की शुरूआत में 4.91 मिलियन किलोग्राम तक पहुँच जाएगा), इसलिये शिपमेंट पर संघर्ष के प्रभाव के बारे में चिंताएं उत्पन्न हुई हैं।
बढ़ती शिपिंग लागत: संघर्ष-संबंधी परिवर्तन के कारण शिपिंग मार्ग लंबे हो जाने से लागत में 15-20प्रतिशत की वृद्धि हुई है। शिपिंग दरों में इस उछाल से भारतीय निर्यातकों के लाभ मार्जिन पर असर पड़ा है, विशेष रूप से निम्न-स्तरीय इंजीनियरिंग उत्पादों, वस्त्रों और परिधानों का व्यापार करने वाले निर्यातकों के लिये जो माल ढुलाई लागत के प्रति अत्यधिक संवेदनशील हैं। निर्यातकों ने बताया है कि बढ़ती लॉजिस्टिक्स लागत उनके समग्र लाभप्रदता पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकती है, जिससे उन्हें मूल्य निर्धारण रणनीतियों और परिचालन दक्षताओं पर पुनर्विचार करने के लिये बाध्य होना पड़ सकता है।
भारत-यूरोप आर्थिक गलियारा
भारत की जी-20 अध्यक्षता के दौरान भारत, खाड़ी और यूरोप को जोड़ने वाला एक कुशल व्यापार मार्ग बनाने के लिये कटएउ का उद्देश्य स्वेज नहर पर निर्भरता को कम करना है, साथ ही चीन की बेल्ट एंड रोड पहल का सामना करना है। जारी संघर्ष से इस गलियारे की प्रगति और व्यवहार्यता को खतरा है, जिससे भारत और उसके साझेदारों के बीच द्विपक्षीय व्यापार के साथ-साथ क्षेत्रीय आर्थिक गतिशीलता पर भी असर पड़ रहा है।
कच्चे तेल की कीमतों पर असर
चल रहे संघर्ष के कारण वैश्विक कच्चे तेल की कीमतों में उछाल आया है, ब्रेंट क्रूड 75 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुँच गया है। चूँकि ईरान एक प्रमुख तेल उत्पादक है, इसलिये किसी भी सैन्य वृद्धि से तेल की आपूर्ति बाधित हो सकती है, जिससे कीमतें और भी बढ़ सकती हैं। तेल की ऊची कीमतें केंद्रीय बैंकों को ब्याज दरों में कटौती करने से रोक सकती हैं, क्योंकि बढ़ी हुई मुद्रास्फीति आर्थिक सुधार के प्रयासों को जटिल बना सकती है।
भारतीय बाजारों पर प्रभाव
भारत तेल आयात पर बहुत अधिक निर्भर है (इसकी 80 प्रतिशत से अधिक तेल की जरूरतों की पूर्ति विदेशों से होती है), जिससे यह कीमतों में उतार-चढ़ाव के प्रति संवेदनशील हो जाता है। तेल की कीमतों में निरंतर वृद्धि से निवेशकों का ध्यान भारतीय इक्विटी से हटकर बॉन्ड या सोने जैसी सुरक्षित परिसंपत्तियों की ओर जा सकता है। भारतीय शेयर बाजार पर इसका प्रभाव पहले ही पड़ चुका है, तथा लंबे समय तक संघर्ष चलने की आशंका के बीच सेंसेक्स और निफ्टी जैसे प्रमुख सूचकांक गिरावट के साथ खुले।
सुरक्षित परिसंपत्ति के रूप में सोना
भू-राजनीतिक तनाव और निवेश रणनीतियों में बदलाव के कारण सोने की कीमतें नई ऊँचाइयों पर पहुँच गई हैं। अनिश्चितता के समय में निवेशक प्राय: सुरक्षित निवेश के रूप में सोने की ओर आकर्षित होते हैं, जिससे इसकी कीमत और बढ़ सकती है।
रसद संबंधी चुनौतियां
भारतीय निर्यातक वर्तमान में प्रतीक्षा और निगरानी की स्थिति में हैं। कुछ निर्यातक सरकार से विदेशी शिपिंग कंपनियों पर निर्भरता कम करने के लिये एक प्रतिष्ठित भारतीय शिपिंग लाइन विकसित करने में निवेश करने का आग्रह कर रहे हैं, जो प्राय: उच्च परिवहन शुल्क लगाती हैं।

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