सिंगला बांध : बिफरे किसानों का 100 ट्रैक्टरों के साथ हल्ला बोल, जमीन अधिग्रहण का विरोध, कलक्ट्रेट का घेराव
4 घंटे सड़क जाम से झुका प्रशासन, वापस लौटाने पड़े अधिकार
कासं/अजमेर। सिंगला बांध क्षेत्र में किसानों की जमीनों के जबरन अधिग्रहण के खिलाफ आक्रोश की चिंगारी सुलगती हुए अजमेर की सड़कों तक पहुंच गई। पिछले 20 दिन से बांध पर शांतिपूर्ण धरना दे रहे 5 गांवों के किसान अब सीधे आर-पार के मूड में आ गए हैं। किसान महापंचायत के राष्ट्रीय अध्यक्ष रामपाल जाट के नेतृत्व में रूपनगढ़ और आसपास के पीड़ित किसान 100 से अधिक ट्रैक्टरों, चौपहिया वाहनों और मोटरसाइकिलों के भारी-भरकम काफिले के साथ 52 किलोमीटर का सफर तय कर अजमेर कलक्ट्रेट घेरने पहुंच गए। प्रशासन ने रास्ते में डंपर, क्रेन और बैरिकेड्स लगाकर जब रास्ता रोकने की कोशिश की, तो किसान आक्रोशित हो गए। किसानों ने शास्त्रीनगर में नगर वन और जनाना मार्ग के सामने ही चक्का जाम कर दिया और सड़क पर धरने पर बैठ गए। लगभग चार घंटे तक चले इस भारी गतिरोध और प्रदर्शन के बाद आखिरकार बैकफुट पर आए प्रशासन ने किसानों को कलक्ट्रेट जाकर घेराव करने की इजाजत दी। इसके बाद जिला कलेक्टर लोकबंधु के साथ हुई वार्ता में किसानों की सभी प्रमुख मांगें मान ली गईं, तब जाकर धरना समाप्त हुआ।
जब पानी की बूंद नहीं आई, जमीन क्यों छीन रहे : प्रदर्शन में शामिल किसान नेताओं और पूर्व मंत्री नसीम अख्तर ने सरकार और जल संसाधन मंत्री व स्थानीय विधायक सुरेश सिंह रावत पर किसानों की अनदेखी का सीधा आरोप लगाया। किसान नेता रामपाल जाट और पूर्व सरपंच उगमाराम ने दो टूक कहा कि 8 जुलाई 1994 के पुराने अवॉर्ड को तत्काल रद्द किया जाए। किसानों का कहना है कि जब से सिंगला बांध बना है, तब से आज तक उसमें पानी की एक बूंद भी नहीं आई है। ऐसे में सिंगला, सिंगारा, थल और श्रीनिंबार्कतीर्थ के 1500 परिवारों की 3000 बीघा उपजाऊ पैतृक जमीन का अधिग्रहण पूरी तरह औचित्यहीन।
बहाल होंगे किसानों के अधिकार :
लगभग चार घंटे तक चले धरने के बाद एएसपी (ग्रामीण) डॉ. लालचंद और एडीएम ने किसानों से बात की। इसके बाद कलेक्टर के साथ हुई वार्ता में सहमति बनी। प्रशासन ने स्पष्ट किया कि किसानों की खातेदारी जमीन उनके पास ही सुरक्षित रहेगी। उत्तराधिकार नामांतरण, केसीसी और सभी सरकारी लाभ यथावत मिलते रहेंगे। अधिगृहीत भूमि को स्थाई रूप से किसानों के खातों में दर्ज कराने के लिए एसडीएम को निर्देश जारी कर अलग फॉर्मेट तैयार कराया गया है।
यह है विवाद की जड़ :
वर्ष 1994 में सिंगला-रूपनगढ़ सिंचाई परियोजना के तहत सिंगला बांध निर्माण के लिए क्षेत्र की लगभग तीन हजार बीघा कृषि भूमि का अधिग्रहण कागजों में किया गया था। हालांकि, बांध बनने के बाद से आज तक उसमें पानी की एक बूंद भी नहीं आई और जमीन पर किसानों का ही कब्जा रहा। पिछले 32 सालों से इन जमीनों पर नामांतरण, केसीसी यानी किसान क्रेडिट कार्ड और क्रय-विक्रय का काम सामान्य रूप से चल रहा था। विवाद तब भड़का जब हाल ही में तहसील प्रशासन ने अचानक इन सभी राजस्व कार्यों पर रोक लगा दी, इससे 1500 किसान परिवारों के सामने आजीविका का संकट खड़ा हो गया।

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