लोकरंग 2026: लक्षद्वीप से लद्दाख तक के फनकारों का जलवा, दक्षिण भारत की सुरीली सौगात भी, 27 अक्टूबर से जेकेके में सजेगा लोक विरासत का महाकुंभ
राजस्थान के लोक नृत्यों की थाप पर झूमेगी गुलाबी नगरी
जयपुर। गुलाबी नगरी की फ़िज़ा में एक बार फिर लोक संस्कृति की खुशबू घुलने वाली है। जवाहर कला केन्द्र में 27 अक्टूबर से 6 नवंबर तक 11 दिवसीय राष्ट्रीय लोक कला महोत्सव 'लोकरंग' का 29वां संस्करण आयोजित होगा। मुक्ताकाशी मंच पर लक्षद्वीप, लद्दाख, त्रिपुरा, नागालैंड, असम, मणिपुर, सिक्किम, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, गोवा, गुजरात, जम्मू-कश्मीर, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार, ओडिशा और छत्तीसगढ़ सहित करीब 22 राज्यों के फनकार अपनी जड़ों की रंगत पेश करेंगे।
दक्षिण भारत के फनकार भी बिखेरेंगे रंग
इस बार दक्षिण भारत के लोक कलाकार भी लोकरंग का अहम हिस्सा होंगे। आंध्र प्रदेश के साथ दक्षिण की समृद्ध लोक परंपरा, लयकारी और रंगों की अलग तहज़ीब मंच पर नज़र आएगी, जो उत्तर, पश्चिम, पूरब और पूर्वोत्तर की प्रस्तुतियों के साथ मिलकर देश की विविधता का खूबसूरत गुलदस्ता बनाएगी।
सरहदों से सागर तक, एक मंच पर पूरा हिंदुस्तान
हिमालय की गोद से लेकर अरब सागर के द्वीपों तक की कला एक साथ दिखेगी। लद्दाख और लक्षद्वीप जैसे दूर-दराज़ इलाकों के कलाकार भी अपनी तहज़ीब की झलक पेश करेंगे। पूर्वोत्तर से त्रिपुरा, नागालैंड, असम, मणिपुर और सिक्किम, पश्चिम से महाराष्ट्र, गोवा और गुजरात, तो उत्तर से जम्मू-कश्मीर, उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश की प्रस्तुतियां रंग भरेंगी। मध्य प्रदेश, बिहार, ओडिशा और छत्तीसगढ़ की लोक परंपराएं भी महफ़िल की शान बनेंगी।
राजस्थान की माटी से उठेगी थाप
मेज़बान राजस्थान की माटी की महक सबसे पहले मंच पर बिखरेगी। चांग की मस्ती भरी थाप, गैर की जोशीली गूंज, तेरहताली की बेमिसाल नफ़ासत और चकरी की फिरकी-सी चपलता दर्शकों को रेगिस्तानी रंगों में सराबोर कर देगी।
शिल्पग्राम में हुनर की महफ़िल
लोकरंग के दौरान शिल्पग्राम में राष्ट्रीय हस्तशिल्प मेला भी लगेगा, जहां लगभग 150 शिल्पकार अपनी कारीगरी का प्रदर्शन करेंगे। हथकरघा वस्त्र, पारंपरिक आभूषण, टेराकोटा, काष्ठ कला, चमड़े की नक्काशी, लोक चित्रकला और धातु शिल्प जैसी दुर्लभ कलाएं एक ही छत के नीचे मिलेंगी। जयपुरवासियों और सैलानियों को प्रमाणिक हस्तशिल्प खरीदने का शानदार मौका मिलेगा। लोकरंग केवल उत्सव नहीं, लुप्तप्राय परंपराओं के संरक्षण और नई पीढ़ी को अपनी विरासत से जोड़ने का मज़बूत ज़रिया भी है।

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