कलम की शुरुआत बचपन से, मंच तक सफर आत्मविश्वास से : कविता केवल सौंदर्य का माध्यम नहीं, समाज और सत्ता से सवाल करने का सशक्त औजार भी
डूबती संस्कृति का सहारा है कविता
शब्दों के जरिए देशभक्ति, पीड़ा और सवालों को स्वर देने वाले युवा कवि अपूर्व बिक्रम शाह आज की पीढ़ी के उन रचनाकारों में शामिल हैं। जिनकी कविताओं में सिर्फ भाव नहीं, बल्कि विचार और विवेक भी साफ झलकता है। बचपन में शुरू हुआ लेखन का यह सफर आज कवि सम्मेलनों के मंचों तक पहुंच चुका है।
जयपुर। शब्दों के जरिए देशभक्ति, पीड़ा और सवालों को स्वर देने वाले युवा कवि अपूर्व बिक्रम शाह आज की पीढ़ी के उन रचनाकारों में शामिल हैं। जिनकी कविताओं में सिर्फ भाव नहीं, बल्कि विचार और विवेक भी साफ झलकता है। बचपन में शुरू हुआ लेखन का यह सफर आज कवि सम्मेलनों के मंचों तक पहुंच चुका है। जहां उन्हें श्रोताओं का भरपूर स्नेह मिल रहा है। अपूर्व बिक्रम शाह बताते हैं कि उन्होंने मात्र 7 वर्ष की उम्र से लिखना शुरू कर दिया था। बचपन में शब्दों से खेलने की यह आदत धीरे-धीरे कविता में बदल गई। आगे की पढ़ाई के लिए वे नैनीताल गए। जहां उन्होंने लगभग 10 वर्ष बिताए। अंग्रेजी माध्यम में शिक्षा लेने के बावजूद हिंदी भाषा के प्रति उनका लगाव कभी कम नहीं हुआ।
हिंदी से जुड़ाव, कविता से पहचान
नैनीताल में रहते हुए ही उन्होंने कविता लिखने और मंच पर बोलने की शुरुआत की। इसी दौरान उन्होंने स्वयं को लगातार तराशा। 12वीं के बाद वर्ष 2018-19 से कवि सम्मेलनों में जाना शुरू किया और यहीं से उनका सार्वजनिक साहित्यिक सफर शुरू हुआ, जो आज भी पूरी ऊर्जा के साथ जारी है।
शहीदों की कहानियों से प्रेरणा
अपूर्व कहते हैं कि जब भी किसी फि ल्म, अखबार या कहानी में शहीदों का जिक्र आता है, तो मन भीतर तक झकझोर जाता है। देश के लिए घर-परिवार और बच्चों तक का त्याग करने वाले वीर जवानों का बलिदान उन्हें विशेष रूप से प्रेरित करता है। इसी कारण वे अधिकतर कविताएं देश के वीर शहीदों और जवानों पर लिखते हैं, ताकि लोग उनके त्याग को समझें और याद रखें।
वीर रस में देश की पीड़ा
वे अपनी साहित्यिक पहचान को 'वीर रस' से जोड़ते हैं। उनकी कविताओं में देश की पीड़ा स्पष्ट सुनाई देती है। चाहे वह बेरोजगारी की समस्या हो या फिर कोई अत्याचार। अपूर्व का मानना है कि कविता केवल सौंदर्य का माध्यम नहीं, बल्कि समाज और सत्ता से सवाल करने का सशक्त औजार भी है।
डूबती संस्कृति का सहारा है कविता
आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में कविता को वे डूबती हुई संस्कृति, सभ्यता और संस्कारों के लिए एक तिनके का सहारा मानते हैं। उनका कहना है कि सोशल मीडिया और नवाचार के इस दौर में भी कविता लोगों के हृदय में जीवंत है और संवेदनाओं को बचाए हुए है।
नए प्रयोग और युवा पीढ़ी
अपूर्व मानते हैं कि कविता में नए-नए प्रयोग होने चाहिए। आज का युवा नए तरीकों से कविता लिखने में रुचि दिखा रहा है। इससे उनका मनोबल बढ़ेगा और साहित्य को नई दिशा मिलेगी। कविता युगों-युगों से सत्ता से सवाल करती आई है, लेकिन आज के दौर में कहीं न कहीं वह अपने मूल धर्म से भटक रही है। कविता की आत्मा को बचाए रखना आज के कवियों की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है।

Comment List