महिला हो, सिलेंडर नहीं उठा पाओगी : नहीं दी नियुक्ति, देना होगा 12 लाख मुआवजा
हेल्पर के लिए किया था आवेदन
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन लिमिटेड (आईओसी) को एक योग्य महिला उम्मीदवार सुमित्रा को 12 लाख रुपए मुआवजा देने का आदेश दिया है। आईओसी ने उसे केवल महिला होने के कारण एलपीजी बॉटलिंग प्लांट में रीफिलिंग हेल्पर की नौकरी देने से मना कर दिया गया था।
मामला 38 साल पुराना है। हरियाणा के गुढ़ा गांव की रहने वाली सुमित्रा ने 1998 में इंडियन ऑयल कारपोरेशन में खलासी, चपरासी या रीफिलिंग हेल्पर के पद के लिए इंटरव्यू दिया था। सुमित्रा का नाम उन 49 लोगों की सूची में शामिल था जिनकी सिफारिश डिप्टी कमिश्नर की अध्यक्षता वाली कमेटी ने आईओसी के एलपीजी बॉटलिंग प्लांट के लिए की थी। लेकिन सुमित्रा को नौकरी नहीं मिली जबकि बाकी लोगों को नियुक्ति पत्र दिए गए।
कोर्ट में पलटते रहे फैसले :
उसके बाद, सुमित्रा ने फैसले को ट्रायल कोर्ट में चुनौती दी। ट्रायल कोर्ट ने कहा कि महिला नौकरी के लिए तय योग्यता पूरी करती थीं। ट्रायल कोर्ट के फैसले को आईओसी ने अपील की और 6 अगस्त 1993 में ट्रायल कोर्ट का फैसला पलट दिया। इसके बाद सुमित्रा ने पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट का रुख किया। हाईकोर्ट ने अक्टूबर 2025 में निचली अदालत का फैसला पलट दिया जिसमें आईओसी को सुमित्रा को मजदूर के अलावा किसी दूसरे पद पर नियुक्त करने का निर्देश दिया गया था।
आईओसी के वकील की दलील :
हाईकोर्ट के फैसले को आईओसी ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। आईओसी के वकील ने कहा कि इस काम में भारी एलपीजी सिलेंडर उठाने पड़ते हैं और रात की शिफ्ट होती है, इसलिए शायद अधिकारियों ने महिला को उपयुक्त नहीं माना।
कोर्ट ने पूछा : क्या महिलाएं घरों में सिलेंडर नहीं उठाती ?
सुप्रीम कोर्ट ने आईओसी के वकील से सवाल किया कि क्या महिलाएं घरों में गैस सिलेंडर नहीं उठातीं। कोर्ट ने कहा कि हम भारत में रहते हैं और हर दिन महिलाओं के सम्मान की बात करते हैं। हम कहते हैं कि महिला देवी के समान है। ऐसे में भारत सरकार की एक कंपनी की ओर से यह महिला गरिमा का अपमान है।

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