वर्ल्ड मेंटल हेल्थ डे : रील के मायाजाल में खोता बचपन, मोबाइल की गिरफ्त में किशोरों और युवाओं का मन
जयपुर में बदलती डिजिटल आदतों के बीच मानसिक स्वास्थ्य बना बड़ी चुनौती
जयपुर। पढ़ाई के लिए हाथ में आया मोबाइल कब बच्चों और युवाओं के मनोरंजन और फिर उनकी आदत का हिस्सा बन जाता है, इसका पता कई बार परिवार को भी देर से चलता है।
सोशल मीडिया पर रील देखते-देखते घंटों गुजर जाना, दोस्तों से दूरी, खेलकूद में घटती रुचि और नींद की कमी किशोरों के मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकती है। विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस के अवसर पर डिजिटल दौर में बच्चों के बचपन और मानसिक सेहत पर इसके प्रभाव को समझना जरूरी है। राजस्थान में किए गए कुछ सीमित अध्ययनों में अध्ययनरत किशोरों के बीच मॉडरेट प्रॉब्लमैटिक इंटरनेट यूज की संयुक्त व्यापकता 21.5 प्रतिशत बताई गई है। एक अध्ययन में 73 प्रतिशत विद्यार्थियों में नोमोफोबिया और 83 प्रतिशत में फोन खोने पर घबराहट की बात सामने आई। वहीं राजधानी जयपुर के सेठी कॉलोनी स्थित मनोचिकित्सा केन्द्र में सप्ताह में दो दिन विशेष रूप से बच्चों और किशोरों के मानिसक स्वास्थ्य को लेकर चलाई जाने वाली ओपीडी में हर महीने करीब 15 से 20 केस सोशल मीडिया, रील्स और स्क्रीन टाइम के कारण पड़ने वाले मानसिक प्रभाव के आ रहे हैं।
केस स्टोरी : मैदान से मोबाइल स्क्रीन तक पहुंचा आरव: जयपुर के एक विकसित इलाके में रहने वाला 17 वर्षीय आरव पढ़ाई में मेधावी था। क्रिकेट का भी शौकीन था। शाम होते ही दोस्त उसे खेलने के लिए बुलाते लेकिन पढ़ाई के लिए नया मोबाइल मिलने के बाद उसकी दिनचर्या बदलने लगी। पांच मिनट के लिए रील देखने की शुरुआत कब घंटों में बदल गई, उसे पता ही नहीं चला। एक दिन मां उसे स्कूल काउंसलर के पास ले गईं। इसके बाद मनोचिकित्सक से परामर्श कराया गया। स्क्रीन टाइम सीमित करने, दोस्तों के साथ खेलने, जरूरत के समय ही फोन इस्तेमाल करने और नियमित फॉलोअप की सलाह मिली। शुरुआत में मुश्किल हुई लेकिन धीरे-धीरे आरव मैदान में लौटने लगा और उसका आत्मविश्वास भी लौटने लगा। ऐसे कई केस इन दिनों राजधानी जयपुर सहित कई शहरों में सामने आ रहे हैं।
मानसिक-शारीरिक रूप से बीमार कर रहा है सोशल मीडिया : सोशल मीडिया की लगातार नई सामग्री और तुरंत मिलने वाला मनोरंजन मस्तिष्क के रिवॉर्ड सिस्टम को सक्रिय कर सकता है। इससे बार-बार फोन देखने की इच्छा बढ़ सकती है। अत्यधिक इस्तेमाल से नींद, एकाग्रता, पढ़ाई और मनोदशा प्रभावित हो सकती है।
ऐसे बनाएं डिजिटल संतुलन :
-सोने से एक घंटा पहले से मोबाइल से दूरी रखें।
-सुबह उठकर पानी पिएं और धूप लें, तुरंत फोन न उठाएं।
-प्रतिदिन स्क्रीन टाइम की सीमा तय करें।
-सप्ताह में एक दिन डिजिटल डिटॉक्स अपनाएं।
-रोज कम से कम एक घंटा खेलकूद और परिवार-दोस्तों के साथ बिताएं।
-नींद, पढ़ाई या मनोदशा लगातार प्रभावित हो तो भरोसेमंद व्यक्ति, काउंसलर या मनोचिकित्सक से संपर्क करें।

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