शराब पीने का शौक पड़ा भारी : अब आधी तनख्वाह पर घर-परिवार की जिम्मेदारी! नशे में डूबे सरकारी कार्मिकों पर गाज गिराने का 2013 का आदेश चर्चा में
परिवार की उपेक्षा और नशे की लत पर सख्ती का प्रावधान
जयपुर। सरकारी नौकरी, हर महीने पक्की तनख्वाह और फिर शराब का शौक! लेकिन अगर इस शौक के चक्कर में पत्नी-बच्चों और बूढ़े माता-पिता की जिम्मेदारी ही भुला दी तो जेब पर सरकारी कैंची चल सकती है। राजस्थान सरकार के कार्मिक विभाग का 20 सितंबर 2013 का एक परिपत्र इसी वजह से दिलचस्प है। इसमें शराब और नशीले पदार्थों के आदी ऐसे सरकारी कार्मिकों के खिलाफ कार्रवाई का प्रावधान बताया गया है, जो अपने परिवार की उचित देखभाल करने में नाकाम रहते हैं।
आदेश का संदेश साफ है- सरकारी नौकरी केवल वेतन पाने का जरिया नहीं, परिवार के प्रति जिम्मेदारी निभाने का भी नाम है। यदि कार्मिक नशे में डूबकर अपनी जिम्मेदारियों से मुंह मोड़ता है, तो इसका खामियाजा उसकी तनख्वाह को भी भुगतना पड़ सकता है।
आधी तनख्वाह सीधे परिवार के खाते में :
परिपत्र में राजस्थान सिविल सेवा (आचरण) नियम, 1971 के नियम-4 के उपनियम-VI का हवाला देते हुए कहा गया है कि कोई भी सरकारी कर्मचारी पर्याप्त और उचित कारण के बिना अपनी पत्नी, माता-पिता, नाबालिग या दिव्यांग संतान का भरण-पोषण करने में लापरवाही करता है अथवा जिम्मेदारी से इनकी देखभाल नहीं करता, तो उसके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की जा सकती है। परिपत्र में यह भी कहा गया है कि नियम-26 के उपनियम (d) के तहत कोई राजसेवक मादक द्रव्य का अत्यधिक सेवन नहीं करेगा।
जांच में दोषी मिला तो वेतन का हिसाब बदलेगा :
आदेश के मुताबिक, यदि विश्वसनीय सूचना या परिजनों की शिकायत के आधार पर किसी कार्मिक के शराब अथवा अन्य नशीले पदार्थों का आदी होने की बात सामने आती है, तो नियमानुसार जांच के बाद दोषी पाए जाने पर उसके मासिक वेतन का 50 प्रतिशत हिस्सा पारिवारिक दायित्वों के निर्वहन के लिए निर्धारित किया जा सकता है। यह राशि कार्मिक के परिजनों के बैंक खाते में सीधे जमा कराने और शेष 50 प्रतिशत राशि कार्मिक के खाते में जमा करने का प्रावधान बताया गया है। पारिवारिक दायित्वों के लिए राशि का निर्धारण परिस्थितियों के अनुसार किया जाना है। यानी मामला केवल शराब पीने तक सीमित नहीं है। असली सवाल यह है कि नशे की आदत के कारण कर्मचारी अपने परिवार की जिम्मेदारी से तो नहीं भाग रहा।
अफसरों को भी दी गई थी जिम्मेदारी :
कार्मिक विभाग ने सभी आहरण एवं वितरण अधिकारियों (डीडीओ) और नियंत्रक अधिकारियों को निर्देश दिए थे कि वे इस संबंध में नियमानुसार कार्रवाई सुनिश्चित करें। परिपत्र का उद्देश्य साफ तौर पर परिवार के भरण-पोषण की जिम्मेदारी तय करना और नशे की वजह से होने वाली उपेक्षा पर लगाम लगाना था।

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