यूपीआई पर एमडीआर का बोझ छोटे कारोबारियों पर डालना उचित नहीं : बाबूलाल गुप्ता
भारतीय उद्योग व्यापार मंडल ने उठाई आवाज
जयपुर। यूपीआई लेन-देन पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (एमडीआर) लगाए जाने संबंधी दावे को लेकर भारतीय उद्योग व्यापार मंडल ने चिंता जताई है। संगठन के राष्ट्रीय अध्यक्ष बाबूलाल गुप्ता ने केंद्र सरकार से इस व्यवस्था पर पुनर्विचार करने और मामले को संबंधित यूपीआई स्टीयरिंग कमेटी के समक्ष भेजने की मांग की है। गुप्ता ने कहा कि संगठन के अनुसार प्रस्तावित व्यवस्था में एमएसएमई और छोटे दुकानदारों के यूपीआई लेन-देन पर एमडीआर का भार पड़ सकता है। महंगाई के मौजूदा दौर में छोटे मूल्य के लेन-देन पर भी शुल्क लगने से व्यापारियों की लागत बढ़ेगी। उनका कहना है कि अंततः इसका असर उपभोक्ताओं पर पड़ सकता है।
उन्होंने कहा कि फल-सब्जी विक्रेता, दवा दुकानदार, किराना व्यापारी, चाय-पकौड़ी विक्रेता, जूते-चप्पल, प्लास्टिक सामान, खिलौने, कटलरी, स्कूल ड्रेस, निर्माण सामग्री, रंग-रोगन सहित विभिन्न छोटे कारोबार करने वाले व्यापारी रोजाना यूपीआई के माध्यम से भुगतान स्वीकार करते हैं। ऐसे कारोबार में लाभ का मार्जिन सीमित होने के कारण अतिरिक्त शुल्क उनके लिए आर्थिक दबाव बढ़ा सकता है।
बैंकों और भुगतान कंपनियों को लाभ का आरोप
भारतीय उद्योग व्यापार मंडल ने आरोप लगाया कि एमडीआर की व्यवस्था से बैंकों तथा भुगतान एप्लीकेशन प्रोवाइडर एजेंसियों को लाभ पहुंचाने का रास्ता खुल सकता है। गुप्ता ने कहा कि यूपीआई निम्न और मध्यम आय वर्ग के व्यापारियों के लिए भुगतान का महत्वपूर्ण माध्यम बन चुका है। ऐसे में इस पर अतिरिक्त वित्तीय भार डालने से पहले इसके संभावित प्रभावों का व्यापक आकलन किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार यूपीआई लेन-देन को अधिक सुरक्षित और प्रभावी बनाने की दिशा में काम कर रही है, लेकिन मौजूदा व्यवस्था में देश के 5 करोड़ से अधिक व्यापारियों पर संभावित प्रभाव को भी ध्यान में रखना जरूरी है।
यूपीआई स्टीयरिंग कमेटी से पुनर्विचार की मांग
गुप्ता ने मांग की कि एमडीआर व्यवस्था लागू करने से पहले मामले को संबंधित यूपीआई स्टीयरिंग कमेटी को पुनर्विचार के लिए भेजा जाए। उन्होंने कहा कि छोटे एवं मध्यम व्यापारियों तथा उपभोक्ताओं के हितों को ध्यान में रखते हुए यूपीआई भुगतान व्यवस्था को सरल और कम लागत वाला बनाए रखना आवश्यक है।

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