कभी सरपंचों के हाथ में थी प्रधानों और जिला प्रमुखों की चाबी, 1995 में बदला चुनाव का गणित
73वें संविधान संशोधन ने ग्रामीण लोकतंत्र को दी नई दिशा
जयपुर। राजस्थान में पंचायत चुनाव का नाम आते ही आज गांव-गांव प्रचार, घर-घर जनसंपर्क, जातीय और सामाजिक समीकरणों की चर्चा तथा मतदाताओं को अपने पक्ष में करने की कवायद नजर आती है, लेकिन करीब तीन दशक पहले तक ग्रामीण राजनीति का चुनावी गणित काफी अलग था। उस समय ग्राम पंचायत के सरपंचों और दूसरे निर्वाचित प्रतिनिधियों की भूमिका पंचायत समिति के गठन और प्रधान के चुनाव में बेहद अहम हुआ करती थी। प्रधान और जिला प्रमुख की कुर्सी तक पहुंचने के लिए केवल जनता के बीच लोकप्रियता ही नहीं, बल्कि निर्वाचित प्रतिनिधियों का समर्थन जुटाना भी जरूरी था। समय के साथ पंचायती राज व्यवस्था में बदलाव आया और 1995 के चुनाव इस बदलाव के महत्वपूर्ण पड़ाव बने। नई संवैधानिक व्यवस्था के तहत पंचायत समिति और जिला परिषद के सदस्यों के चुनाव में मतदाताओं की सीधी भागीदारी हुई।
1959 में नागौर से शुरू हुआ था पंचायती राज का सफर : राजस्थान में पंचायती राज व्यवस्था की शुरुआत 2 अक्टूबर 1959 को नागौर से हुई थी। तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने इसका उद्घाटन किया था। इसका उद्देश्य गांवों में सत्ता का विकेंद्रीकरण करना और विकास से जुड़े फैसलों में स्थानीय लोगों की भागीदारी बढ़ाना था। इस व्यवस्था में ग्राम पंचायत, पंचायत समिति और जिला परिषद को ग्रामीण प्रशासन की महत्वपूर्ण इकाइयों के रूप में विकसित किया गया। हालांकि, शुरुआती दशकों में चुनाव की प्रक्रिया आज जैसी नहीं थी। इसी वजह से पंचायत चुनावों में सरपंचों और दूसरे निर्वाचित प्रतिनिधियों का राजनीतिक महत्व काफी अधिक था।
पहले यूं बनते थे प्रधान और जिला प्रमुख : पुरानी व्यवस्था में ग्राम पंचायत के पंच और सरपंच जनता के मतदान से चुने जाते थे, लेकिन पंचायत समिति और जिला परिषद के गठन में अलग प्रक्रिया अपनाई जाती थी। पंचायत समिति में ग्राम पंचायतों के सरपंच पदेन सदस्य के रूप में शामिल होते थे। प्रधान के चुनाव में पंचायत समिति के सदस्यों के साथ ग्राम पंचायतों के प्रतिनिधियों की भी भूमिका रहती थी। इसलिए जिला प्रमुख के चुनाव में भी निर्वाचित प्रतिनिधियों का समर्थन महत्वपूर्ण माना जाता था। प्रत्याशी और राजनीतिक दल मतदाताओं के साथ-साथ प्रभावशाली सरपंचों तथा अन्य प्रतिनिधियों से भी संपर्क साधते थे।
1965 के बाद 13 साल तक नहीं हुए आम चुनाव : राजस्थान में पंचायती राज संस्थाओं के चुनावों का इतिहास कई उतार-चढ़ाव से भरा रहा है। राज्य निर्वाचन आयोग के चुनावी इतिहास के अनुसार प्रदेश में पहला आम चुनाव 1960 में हुआ था। इसके बाद 1965, 1978, 1981 और 1988 में आम चुनाव हुए। इन आंकड़ों में सबसे उल्लेखनीय बात यह है कि 1965 के बाद अगला आम चुनाव 1978 में हुआ। यानी पंचायत राज संस्थाओं के चुनावों के बीच करीब 13 साल का अंतर रहा। यह दौर बताता है कि ग्रामीण लोकतंत्र की नियमित चुनावी व्यवस्था हमेशा एक जैसी नहीं रही।
73वें संविधान संशोधन से आया बड़ा बदलाव : देश में पंचायती राज संस्थाओं को संवैधानिक आधार देने के लिए संसद ने 1992 में 73वां संविधान संशोधन पारित किया। यह 24 अप्रैल 1993 से प्रभावी हुआ। इसके बाद राजस्थान में पंचायती राज अधिनियम, 1994 लागू किया गया और जुलाई 1994 में राज्य निर्वाचन आयोग का गठन हुआ। नए प्रावधानों के तहत 1995 में पंचायत राज संस्थाओं के आम चुनाव कराए गए। यह चुनाव ग्रामीण लोकतंत्र की व्यवस्था में महत्वपूर्ण बदलाव का पड़ाव साबित हुआ।
अब प्रधान और जिला प्रमुख का चुनाव कैसे होता है : वर्तमान व्यवस्था में मतदाता अपने क्षेत्र से पंचायत समिति सदस्य और जिला परिषद सदस्य चुनते हैं। इसके बाद पंचायत समिति के निर्वाचित सदस्य अपने बीच से प्रधान और उपप्रधान चुनते हैं। इसी तरह जिला परिषद के निर्वाचित सदस्य अपने बीच से जिला प्रमुख और उपजिला प्रमुख का चुनाव करते हैं।

Comment List