जब अपनों ने छोड़ा साथ, कोटा के इस आश्रम ने थामा हाथ
400 बेड की क्षमता में मिल रहा उपचार और अपनों जैसा दुलार
कोटा। जब अपने साथ छोड़ दें, बीमारी शरीर को तोड़ दे और मानसिक स्थिति ऐसी हो जाए कि इंसान घर का रास्ता तक भूल जाए, तब जिंदगी में उम्मीद की किरण बनकर कोई हाथ थाम ले तो वही सबसे बड़ा सहारा बन जाता है। कोटा के विज्ञान नगर स्थित ‘अपना घर’ आश्रम ऐसे ही निराश्रित, असहाय और मानसिक रूप से अस्वस्थ लोगों के लिए उम्मीद का घर बना हुआ है। यहां उन्हें केवल भोजन, कपड़े और इलाज ही नहीं, बल्कि सम्मान, सुरक्षा और परिवार जैसा अपनापन भी मिलता है। आश्रम में हर जरूरतमंद को ‘प्रभुजी’ कहकर संबोधित किया जाता है। यही संबोधन संस्था की सेवा भावना और मानवीय संवेदना को दर्शाता है।
भरतपुर से शुरू हुआ सेवा का सफर
आश्रम के सलाहकार धर्मनारायण दुबे ने बताया कि ‘अपना घर’ की शुरुआत 29 जून 2000 को भरतपुर के बड़झेरा गांव में हुई थी। मां माधुरी बृज वारिस सेवा सदन की स्थापना डॉ. बीएम भारद्वाज और उनकी पत्नी डॉ. माधुरी भारद्वाज ने सहयोगियों के साथ की थी। इसका उद्देश्य निराश्रित और असहाय लोगों को उपचार और सहारा देना था। इसी क्रम में राज्य सरकार के आग्रह पर 22 जनवरी 2012 को कोटा में 50 बेड की क्षमता के साथ महिला आश्रम के रूप में इसकी शुरुआत हुई। वर्तमान में विज्ञान नगर के छत्रपुर रोड स्थित परिसर में 400 बेड की क्षमता के साथ आश्रम संचालित है।
आठ साल से आश्रम में रह रहे दीपक
आश्रम में रह रहे दीपक रामचंद्र सावनके की कहानी अपनों से बिछड़ने का दर्द बयां करती है। वर्ष 1972 में महाराष्ट्र से कोटा आए दीपक यहां एक फैक्ट्री में काम करते थे। काम के दौरान हादसा होने से वे काम करने में असमर्थ हो गए और रोजगार छिन गया। उम्मीद लेकर महाराष्ट्र स्थित घर पहुंचे तो परिजनों ने उन्हें पहचानने से इनकार कर दिया। निराश होकर वे वापस कोटा लौट आए। इसके बाद ‘अपना घर’ आश्रम में उन्हें रहने, भोजन और देखभाल का सहारा मिला। दीपक पिछले आठ वर्षों से यहां रह रहे हैं।
दवा से लेकर दुलार तक की व्यवस्था
आश्रम में छह चिकित्सक सेवाएं दे रहे हैं, जिनमें दो फिजिशियन और चार मनोचिकित्सक शामिल हैं। नर्सिंगकर्मी 24 घंटे देखभाल के लिए उपलब्ध रहते हैं। नियमित दवाइयों और उपचार के साथ प्रभुजनों को भजन-कीर्तन, खेलकूद और व्यायाम जैसी गतिविधियों से जोड़ा जाता है। जन्मदिन, वैवाहिक वर्षगांठ और त्योहार भी उनके साथ मनाए जाते हैं, ताकि उन्हें अकेलेपन का अहसास न हो। शहरवासी भी अपने विशेष अवसरों पर आश्रम पहुंचकर उनके साथ खुशियां बांटते हैं।
स्वस्थ होने पर परिवार से मिलाने का प्रयास
आश्रम में उपचार के बाद जिन प्रभुजनों की स्थिति में सुधार होता है और जो अपने परिवार की जानकारी दे पाते हैं, उन्हें परिजनों तक पहुंचाने और पुनर्वासित करने का प्रयास किया जाता है। हालांकि, गंभीर बीमारी या पहचान नहीं मिल पाने के कारण सभी की घर वापसी संभव नहीं हो पाती। ऐसे में आश्रम उनकी देखभाल जारी रखता है। किसी प्रभुजी की मृत्यु होने पर भी पूरे सम्मान के साथ अंतिम संस्कार किया जाता है।यहां सेवा का उद्देश्य केवल किसी को छत और भोजन देना नहीं, बल्कि उसे यह अहसास कराना है कि परिस्थितियां चाहे जैसी हों, वह अकेला नहीं है। ‘अपना घर’ उन लोगों के लिए उम्मीद बन रहा है, जिन्हें जिंदगी ने अपनों से दूर कर दिया।

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