ना वादे पूरे हुए और ना कोशिशें कामयाब,कोरोना में अनाथ हुए बच्चों की सुध लेने वाला कोई नहीं
18 वर्ष पार करते ही बंद हुई पेंशन, कोई मेडिकल तो कोई प्रतियोगी परीक्षाओं की कर रहा तैयारी
कोटा। कहते हैं वादे टूट जाते हैं लेकिन कोशिशें कामयाब हो जाती हैं। लेकिन सरकारी सिस्टम में ना वादे पूरे हो रहे और ना ही कोशिशें कामयाब हो रही हैं, केवल कागजी कार्रवाई पूरी हो रही है। कोरोना काल में अपने माता-पिता को खोने वाले अनाथ बच्चों के पुनर्वास के लिए बड़े-बड़े दावे किए गए थे, लेकिन महामारी का शिकार हुए इन बच्चों के बालिग होते ही सरकारी पेंशन और सहायता का पहिया थम गया है। 18 वर्ष की आयु पार करने के बाद न तो वादे के मुताबिक पूरी आर्थिक मदद मिल रही है और न ही रोजगार के रास्ते आसान हो रहे हैं।
सकतपुरा की तीन बहनों का दर्द: पेंशन बंद, अनुदान का इंतजार
सकतपुरा निवासी स्व. लक्ष्मीनारायण सुमन (वर्ष 2017) और उनकी पत्नी (वर्ष 2021 में कोरोना से निधन) की तीन बेटियां—प्रिया, प्राची और कशिश सुमन—इन दिनों गंभीर आर्थिक संकट से जूझ रही हैं। परिवार की दूसरे नंबर की बेटी और बीए सेकंड ईयर की छात्रा प्राची सुमन ने बताया कि 18 वर्ष की आयु पूरी होते ही मिलने वाली मासिक सहायता और पालनहार योजना बंद हो गई, लेकिन भविष्य के लिए घोषित 5 लाख रुपये की अनुदान राशि अब तक नहीं मिली है।
घर में बुजुर्ग दादी हैं और बड़ी बहन प्रिया (पूर्व सीएम हेल्पलाइन कर्मी) ने अभी तक घर नहीं बसाया बल्कि पूरा जिम्मा उठाया हुआ है। प्राची का कहना है कि वे लगातार दस्तावेज जमा करा रही हैं, लेकिन कभी पुलिस वेरिफिकेशन तो कभी किसी कागज़ की कमी बताकर चक्कर कटवाए जा रहे हैं। वहीं, सबसे छोटी बहन कशिश (15 वर्ष), जो 9वीं कक्षा में है, उसकी पढ़ाई का खर्च उठाना इन बहनों के लिए पहाड़ जैसा साबित हो रहा है।
17 में से 9 बच्चे बालिग, 5 लाख के अनुदान को तरस रहे युवा
विभागीय आंकड़ों के अनुसार, कोटा जिले में कोविड के दौरान अनाथ हुए कुल 17 बच्चों का रजिस्ट्रेशन हुआ था, जिनमें से 9 बच्चे अब बालिग हो चुके हैं। घोषणा के अनुसार 18 वर्ष पूरे होने पर इनके खातों में 5 लाख रुपये आने थे। जमीनी हकीकत यह है कि 9 बालिग बच्चों में से केवल 2 को 1-1 लाख रुपये की पहली किस्त नसीब हुई है, जबकि बाकी पूरी राशि के लिए दफ्तरों के चक्कर काट रहे हैं।
मीनाक्षी प्रजापति ने आपबीती साझा करते हुए बताया, "करीब 3 वर्ष पूर्व जब मैं 18 वर्ष की हुई, तो केवल 1 लाख रुपये मिले। मैंने बीए फाइनल कर लिया है और अब मेरी शादी भी हो चुकी है। तभी से मेरा मासिक वजीफा बंद हो गया और सरकारी नौकरी के लिए फॉर्म भरने के बाद आज तक मैं सिर्फ इंतजार कर रही हूँ।"
शिक्षा और संघर्ष के बीच बुलंद हौसला
विपरीत परिस्थितियों के बावजूद ये युवा हार मानने के बजाय अपने सपनों को उड़ान दे रहे हैं। बालिग हो चुके अधिकांश बच्चे उच्च शिक्षा और प्रतियोगी परीक्षाओं में जुटे हैं। मीनाक्षी मेडिकल कोर्स, कशिश बीएसटीसी तैयारी और महावीर पॉलिटेक्निक की पढ़ाई कर रहे हैं। वहीं, लकी, अग्य गौतम और मैना 12वीं कक्षा में हैं, जबकि 9 अन्य बच्चे 10वीं तक की स्कूली शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं। प्राची सुमन पिछले दो साल से अपनी नौकरी की राह देख रही हैं।
धाकड़खेड़ी के विष्णु को कलेक्ट्रेट में मिली नौकरी
इन तमाम संघर्षों के बीच कोटा से एक राहत भरी खबर भी है। धाकड़खेड़ी निवासी विष्णु (22 वर्ष), जिन्होंने कोरोना में अपने माता-पिता को खो दिया था, ने हार नहीं मानी। लगातार प्रशासनिक प्रयासों और दस्तावेजों की पूर्ति के बाद आखिरकार कुछ माह पहले उनकी कोटा कलेक्ट्रेट में एलडीसी के पद पर सरकारी नौकरी लग गई। विष्णु की इस सफलता ने अन्य पीड़ित युवाओं के भीतर उम्मीद की किरण जगाई है।
जिम्मेदार का पक्ष:
"हमारी तरफ से पिछले मई माह में ही बच्चों के परिजनों से एक सामूहिक मीटिंग हुई थी। हम उनके वयस्क होने पर नौकरी के फॉर्म भरवाने की जानकारी भी देते हैं। जो बच्चे अभी नाबालिग हैं, ज्यादातर उन्हीं के बारे में हमारे पास जानकारी रहती है।"
- हुकुम चंद जाजोरिया, सहायक निदेशक, बाल अधिकारिता विभाग, कोटा

Comment List