Voice Of Youth : स्कूलों में किताबें ही नहीं, नैतिकता और संस्कारों का भी पढ़ाया जाए पाठ, मासूमों की सुरक्षा में चूक पर जवाबदेही तय करे प्रशासन
युवा बोले- स्कूलो में काउंसलर, चिकित्सक व निगरानी तंत्र हो पुख्ता
कोटा। घर के बाद स्कूल को बच्चों के लिए सबसे सुरक्षित माना जाता है। अभिभावक इसी भरोसे के साथ मासूम को स्कूल भेजते हैं, लेकिन वहीं जान खतरे में पड़ जाए तो सभ्य समाज की बुनियाद ही चिंता के घरे में आ जाती है। हाल ही में राजकीय महात्मा गांधी इंग्लिश मीडियम वोकेशनल स्कूल में कक्षा-2 के छात्र छात्र पर ब्लेड से हुए हमले की घटना ने इस भरोसे की नींव हिलाकर रख दी।घटना से आहत जेन-जी ने शिक्षा विभाग की भूमिका पर सवाल उठाते हुए जवाबदेही तय करने और किताबी ज्ञान के साथ बच्चों को नैतिक शिक्षा, सही-गलत का फर्क और गुस्से पर नियंत्रण सिखाने, प्रशिक्षित काउंसलर, चिकित्सक की मौजूदगी और सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए जाने की आवश्यकता जताई।
पीरियड बदले तो भी अकेले न रहे बच्चे
स्कूलों में बच्चों के बैग और यूनिफॉर्म की जेबों की नियमित जांच होनी चाहिए। स्टेशनरी के सुरक्षित उपयोग की व्यवस्था बनाने के साथ कक्षाओं में सीसीटीवी कैमरे चालू रखे जाएं। एक पीरियड खत्म होने और दूसरे शिक्षक के आने के बीच बच्चों को अकेला न छोड़ा जाए। किताबी ज्ञान के साथ सहानुभूति, क्रोध नियंत्रण की सीख देना जरूरी है। स्कूलों में प्रशिक्षित बाल काउंसलर नियुक्त किए जाए।
-निकिता वर्मा, छात्रा एलएलएम
स्कूल और परिवार मिलकर निभाएं जिम्मेदारी
कम उम्र के बच्चों से जुड़ी हिंसक घटनाएं गंभीर सामाजिक और कानूनी चिंता का विषय हैं। विद्यालयों में प्रभावी निगरानी, बाल संरक्षण नीतियों और कानूनी प्रावधानों की पालना सुनिश्चित हो। अभिभावक व शिक्षक, बच्चों के व्यवहार, संगति और मानसिक विकास पर ध्यान दें। ऐसी घटनाओं की रोकथाम केवल कानून नहीं, बल्कि परिवार, विद्यालय और समाज की साझा जिम्मेदारी है।
-संगीता कंवर, स्कॉलर विधि शिक्षा
मोबाइल के दुष्प्रभाव व सही-गलत का फर्क सिखाएं
मोबाइल पर हिंसक गेम और सोशल मीडिया की सामग्री के संपर्क के साथ परिवार में संवाद की कमी भी बच्चों के व्यवहार को प्रभावित कर सकती है। स्कूलों में खाली पीरियड और लंच ब्रेक के दौरान निगरानी, नियमित काउंसलिंग, साप्ताहिक बाल सभाओं और नैतिक शिक्षा को बढ़ावा दिया जाए। अभिभावक बच्चों के साथ रोजाना संवाद करें और मोबाइल से अलग उन्हें क्वालिटी समय दें, ताकि उनमें दूसरों के प्रति संवेदनशीलता विकसित हो।
-भूदेव शर्मा, विधि छात्र
हर स्कूल में हो काउंसलर
बच्चों को सही-गलत का अंतर समझाने के लिए हर स्कूल में काउंसलर होना चाहिए, जो उनकी जरूरत के अनुसार नियमित परामर्श दे और नैतिक मूल्यों की सीख दे। स्कूलों में सुरक्षा केवल कैमरे लगाने तक सीमित नहीं रह सकती। बच्चों की निगरानी, चिकित्सा सहायता, व्यवहार में बदलाव की पहचान और शिकायतों पर कार्रवाई का स्पष्ट प्रोटोकॉल फोलो होना जरूरी है।
-विनयराज सिंह, छात्र
सुरक्षा में चूक पर तय हो जवाबदेही, मिले दंड
घर के बाद स्कूल सुरक्षित हो, अभिभावकों का यह भरोसा कायम रखने की जिम्मेदारी शिक्षा विभाग की है। शिक्षा के मंदिर में ही ऐसी घटना होेने पर जिम्मेदार शिक्षक की जवाबदेही तय कर निष्पक्ष जांच हो, लापरवाही मिलने पर दंडित किया जाए, ताकि यह कार्रवाई नजीर बने और भविष्य में ऐसी घटना दोबारा न हो। शाला में प्रभावी निगरानी, प्राथमिक चिकित्सा, आपातकालीन सहायता और प्रशिक्षित काउंसलर की व्यवस्था जरूरी है।
-सानिया पराशर, छात्रा

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