गांधी जयंती पर फिर चरखे की गूंज, खादी में स्वदेशी से ग्लोबल फैशन तक का सफर! राजस्थान में 2 अक्टूबर से खादी पर छूट की परंपरा
ग्रामीण रोजगार और स्वदेशी स्वावलंबन का मजबूत स्तंभ बनी खादी
जयपुर। गांधी जयंती 2 अक्टूबर का दिन केवल राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की जयंती के रूप में ही नहीं, बल्कि खादी और स्वदेशी के विचारों को याद करने का अवसर भी है। गांधीजी के लिए खादी महज कपड़ा नहीं था। यह स्वावलंबन, रोजगार और विदेशी वस्त्रों के बहिष्कार का माध्यम था। सरकारी तंत्र भी खादी को स्वराज, स्वावलंबन और ग्रामीण रोजगार से जोड़ते रहे हैं। आज खादी अपने पारंपरिक स्वरूप के साथ आधुनिक फैशन, गुणवत्ता नियंत्रण और तकनीकी विकास से भी जुड़ गई है।
गांधी जयंती पर क्यों मिलती है छूट
राजस्थान में गांधी जयंती के आसपास खादी वस्त्रों पर विशेष छूट देने की परंपरा रही है। राजस्थान सरकार हर साल 2 अक्टूबर से 30 जनवरी तक खादी वस्त्रों पर 50 प्रतिशत तक की छूट देती है। इसका मकसद केवल ग्राहकों को सस्ता कपड़ा उपलब्ध कराना नहीं, बल्कि कातिनों, बुनकरों और खादी संस्थाओं की बिक्री बढ़ाना तथा ग्रामीण रोजगार को मजबूत करना भी है। राजस्थान में पहले राज्य सरकार की 35 प्रतिशत छूट, मार्केटिंग डेवलपमेंट असिस्टेंस और संस्थागत हिस्सेदारी को मिलाकर 50 प्रतिशत तक की छूट का मॉडल रहा है।
तब खादी कैसे बनती थी
करीब सौ साल पहले खादी बनाने की प्रक्रिया पूरी तरह श्रम आधारित थी। कपास को साफ करने और रेशे अलग करने के बाद उसे धुनकर तैयार किया जाता था। इसके बाद तकली या चरखे पर हाथ से धागा काता जाता था। तैयार धागे को ताना-बाना मिलाकर हाथकरघे पर कपड़ा बुना जाता था। यानी कपास से लेकर शरीर पर पहनने वाले कपड़े तक की पूरी प्रक्रिया में गांव के कारीगर और बुनकर बड़ी भूमिका निभाते थे। गांधीजी ने इस प्रक्रिया को आर्थिक आंदोलन का रूप दिया। चरखा चलाने का संदेश गांव-गांव तक पहुंचाया गया। वर्ष 1921 में गांधीजी ने गरीबी की स्थिति को देखते हुए अपनी पोशाक को भी बेहद सादा कर लिया और खादी उनकी सार्वजनिक जीवन की पहचान बन गई।
आज खादी में क्या बदला
खादी की मूल पहचान आज भी वही है कि हाथ से काता गया धागा और हाथ से बुना गया कपड़ा खादी कहलाता है। यह कपास, ऊन या रेशम जैसे प्राकृतिक रेशों से हाथ से काते गए धागे और हाथ से बुने कपड़े की पहचान है। फर्क इतना है कि अब उत्पादन प्रक्रिया में बेहतर वैज्ञानिक तकनीक, डिजाइन, गुणवत्ता नियंत्रण और आधुनिक विज्ञान जुड़ गए हैं। अब चरखे और करघे के साथ-साथ आधुनिक तकनीक से कातिनों और बुनकरों की मेहनत को कम करने तथा उत्पादन बढ़ाने पर भी काम किया जा रहा है। इसलिए आज खादी केवल टोपी, कुर्ता और धोती तक सीमित नहीं है। इससे शर्ट, जैकेट, साड़ी, सलवार-सूट, कुर्तियां, शॉल, बेडशीट, तौलिया, पर्दे, दरी, रजाई और दूसरे घरेलू उत्पाद भी तैयार किए जा रहे हैं।
राजस्थान में कहां-कहां बनती है खादी
राजस्थान में खादी का काम किसी एक शहर तक सीमित नहीं है। जयपुर, अजमेर-पुष्कर, टोंक, कोटा, भरतपुर, बीकानेर, झुंझुनूं, सीकर, अलवर, भीलवाड़ा, उदयपुर, बांसवाड़ा, बाड़मेर, जैसलमेर और जोधपुर क्षेत्र में विभिन्न खादी बाजार और संस्थाएं काम कर रही हैं। सरकार की ओर से जयपुर, कोटा, भरतपुर और बीकानेर संभागों में कारीगरों और बुनकरों के प्रशिक्षण की व्यवस्था भी की जा रही है। बीकानेर में खादी के साथ ऊनी कपड़ों और गांधी कंबल की भी खास पहचान है। एक प्रमुख खादी संस्था ने यहां ऊनी उत्पादों और हस्तकला से जुड़े उत्पादों का निर्माण शुरू किया है। बाड़मेर में खादी के साथ कढ़ाई और हस्तकला, जबकि जयपुर-सांगानेर क्षेत्र में कपड़ा, परिधान, छपाई और डिजाइन का बड़ा बाजार मौजूद है।
देश की सीमाओं से बाहर पहुंची राजस्थान की खादी
खादी अब केवल देश के अलग-अलग हिस्सों की अलमारियों तक सीमित नहीं है। राजस्थान के खादी उत्पाद अमेरिका, ब्रिटेन, जापान, जर्मनी और यूएई जैसे देशों के बाजारों तक भी पहुंच चुके हैं। इससे स्थानीय कारीगरों और बुनकरों को व्यापक बाजार मिल रहा है। राजस्थान की पारंपरिक कढ़ाई, रंग और प्रिंटिंग खादी को अलग पहचान देते हैं। जयपुर की खादी में पारंपरिक डिजाइन के साथ आधुनिक शैली का मेल देखने को मिलता है, जबकि बीकानेर की खादी में राजस्थानी रंगों की झलक दिखाई देती है। बाड़मेर की विशिष्ट कढ़ाई और प्रिंटिंग इसे खास बनाती है।
फैशन की दुनिया में भी बढ़ी मांग
पिछले कुछ वर्षों में खादी ने फैशन की दुनिया में भी अपनी अलग पहचान बनाई है। खादी के कुर्ते, साड़ी, जैकेट, दुपट्टे और आधुनिक परिधानों की मांग बढ़ी है। युवा वर्ग भी खादी को आधुनिक अंदाज में अपना रहा है। इससे पारंपरिक खादी अब ग्लोबल फैशन का हिस्सा बन रही है। खादी में पारंपरिकता और आधुनिकता के मेल ने इसे नई पीढ़ी के बीच लोकप्रिय बनाया है। कई डिजाइनर और संस्थाएं खादी को नए रंग, डिजाइन और आधुनिक कट के साथ बाजार में ला रही हैं।
ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मिल रहा सहारा
खादी से जुड़ी गतिविधियां लाखों किसानों, कातिनों और बुनकरों को रोजगार देती हैं। इससे ग्रामीण क्षेत्रों की अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलती है। खादी के उत्पादन से जुड़े लोगों के साथ ही इससे संबंधित परिवहन, विपणन, डिजाइन और बिक्री जैसी गतिविधियों में भी रोजगार के अवसर पैदा होते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि खादी का भविष्य केवल भारत तक सीमित नहीं है, बल्कि वैश्विक स्तर पर भी इसकी संभावनाएं बढ़ रही हैं। पर्यावरण के प्रति बढ़ती जागरूकता के दौर में प्राकृतिक रेशों और हाथ से तैयार कपड़ों की मांग इसे नई पहचान दे रही है।
लोगों से बढ़ रही है अपील
खादी प्रेमियों का कहना है कि गांधीजी का सपना था कि देश आत्मनिर्भर बने और स्वदेशी को अपनाए। आज खादी उसी सपने को आगे बढ़ाने का माध्यम बन रही है। गांधी जयंती पर मिलने वाली छूट को केवल खरीदारी का अवसर नहीं, बल्कि स्वदेशी, रोजगार और आत्मनिर्भरता से जुड़ा संदेश भी माना जा रहा है।

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