इलाज कराएं या दिहाड़ी बचाएं, शंभुपुरा वासियों के सामने दो वक्त की रोटी का संकट, 24 किमी दूर मरीज को अस्पताल लेकर आने - जाने में 400 से 500 रुपए होते खर्च
1500 की आबादी फिर भी न पीएचसी न जनता क्लिनिक
कोटा। बीमार शरीर को इलाज चाहिए, लेकिन शंभुपुरा के बाशिंदों के सामने इलाज से पहले रोटी का सवाल खड़ा हो जाता है। शहर के बड़े सरकारी अस्पताल तक पहुंचने के लिए करीब 24 किमी का चक्कर काटना पड़ता है। गांव में नियमित सार्वजनिक नगरीय परिवहन नहीं है। ऐसे में बीमार बुजुर्ग या बच्चे को अस्पताल ले जाने के लिए ऑटो करना पड़े तो आने-जाने में ही करीब 500 रुपए तक खर्च हो जाते हैं। वहीं, मजदूरी करने वाले कई परिवारों की दिनभर की कमाई करीब 400-500 रुपए होती है। यानी, अस्पताल तक पहुंचने का किराया ही एक दिन की दिहाड़ी से ज्यादा पड़ जाता है। अस्पताल जाएं तो दिहाड़ी छूटती है, दिहाड़ी करें तो इलाज टलता है। बार-बार अस्पताल के चक्कर लगें तो घर का चूल्हा जलने पर ही संकट खड़ा हो जाता है। परिवार पाले या इलाज की दौड़ लगाएं...यह पीड़ा शंभुपुरा वासियों ने नवज्योति को बयां की , पेश हैं खबर के प्रमुख अंश....
समय पर इलाज नहीं मिला तो हाथ टेड़ा हो गया
वार्डवासी दिनेश भील (25) की मां कजोड़ी बाई पीड़ा बताते हुए रो पड़ी। उन्होंने कहा, किशोरावस्था में दिनेश साइकिल से समय गिर गया था, कलाई की हड्डी टूट गई थी। यहां अस्पताल नहीं होने से गांव में ही लकड़ी के सहारे हाथ को सीधा कर कपड़े से बांध दिया। हाथ में फफोले पड़ गए। दो दिन बाद जैसे-तैसे 20-25 किमी दूर जेकेलोन ले गए, वहां चिकित्सकों ने हाथ में इंफेक्शन ज्यादा फैलने से हाथ काटने की बात कही, हम घबरा गए और उसे वापस ले आए। बेटे का सीधा हाथ कलाई से पंजे तक टेड़ा हो गया। अंगुलिया भी काम नहीं करती। इस वजह से उसे अब मजदूरी का काम भी नहीं मिलता। यदि वार्ड में ही स्वास्थ्य केंद्र होता तो आज बेटे का हाथ सही रहता।
9 माह का बच्चा, कान में घाव
कोमल बाई का 9 माह का बच्चा भी गंभीर संक्रमण से जूझ रहा है। मां के अनुसार, बच्चे की गर्दन और ठोढ़ी के नीचे दाग हो रहे हैं। एक कान में घाव है, जिससे पीक निकलती है। पीछे की तरफ गर्दन व कंधों पर फोड़े-फूंसी हो रही है। मासूम तकलीफ से बिलखता है। पति मजदूरी करते हैं, एक बार काम छोड़कर नांता पीएचसी दिखाने गए, वहां से नयापुरा जेकेलोन भेज दिया। ऑटो का किराया और बढ़ गया। यदि शंभुपुरा में ही अस्पताल खुले तो इलाज की राह आसान हो जाए।
क्लिनिक खुले तो इलाज मिले, दिहाड़ी भी न छूटे
वार्डवासियों का कहना है कि नगर निगम के वार्ड-1 शंभुपुरा में करीब 1500 की आबादी है। जिसमें 700 से अधिक वोटर हैं। शहरी सीमा में होने के बावजूद इलाका प्राथमिक स्वास्थ्य सुविधा से दूर है। यहां न प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र है और न जनता क्लिनिक। यदि, जनता क्लिनिक खुले तो इलाज भी मिले और दिहाड़ी भी नहीं छुटेगी।
पहले 12 किमी नांता, फिर शहर का दोगुना चक्कर
वार्डवासी धर्मराज, भागीरथ बताते हैं, शंभूपुरा से नांता प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र करीब 12 किमी दूर है। लोग सामान्य बीमारी में वहां पहुंचते हैं, लेकिन गंभीर मरीजों को एमबीएस, जेकेलोन या मेडिकल कॉलेज अस्पताल रेफर कर दिया जाता है, यहीं से परिवार की परेशानी और बढ़ जाती है। क्योंकि, दूरी के हिसाब से किराया भी महंगा हो जाता है। यह खर्च एक-दो बार तक तो संभव है लेकिन बार-बार अस्पताल चक्कर लगे तो रोजी-रोटी पर संकट खड़ा हो जाता है।
शंभुपुरा तक चले सिटी बसें
वार्डवासी सीताराम भील का कहना है, मैं गाड़ियों में पत्थर भरने का काम करता हूं, शाम को 500 रुपए दिहाड़ी मिलती है, जिससे घर का चूल्हा जलता है। ऐसे में बार-बार यहां से 24 किमी दूर शहर के सरकारी अस्पतालों में ऑटो का महंगा किराया लगाकर जाना संभव नहीं हो पाता। क्योंकि, आने-जाने में ही पूरी दिहाड़ी निकल जाती है। उन्होंने नगर निगम से शंभुपुरा तक सिटी बसों का संचालन शुरू करने की मांग की।
गांव में एक ही ऑटो , वो भी हर बार उपलब्ध नहीं
बुजुर्ग रामनाथ व श्रीराम बताते हैं, शंभूपुरा में सार्वजनिक नगरीय परिवहन की सुविधा नहीं होने से लोगों की निर्भरता निजी ऑटो पर है। गांव में एक ही व्यक्ति के पास ऑटो है। जरूरत पड़ने पर उसी से मरीज को अस्पताल ले जाना पड़ता है। कई बार वह उपलब्ध नहीं होने पर नांता से ऑटो बुलाना पड़ता है। तालेड़ा तक नगर निगम की बसें जाती हैं, शंभुपुरा से भी बसों का संचालन हो तो राहत मिले।
वार्डवासियों की मांग पर जनता क्लिनिक खोलने के लिए प्रपोजल बनाकर सरकार के समक्ष भेजेंगे, वहां सेे परमिशन मिलने पर इस दिशा में प्रक्रिया शुरू की जाएगी।
-डॉ. नरेंद्र नागर, सीएमएचओ कोटा

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